GST नियमों में बार-बार बदलाव ने बढ़ाई मुश्किल

जीएसटी की अवधारणा जितनी अच्छी है, उतनी ही मुश्किलों की फेहरिस्त भी है। किसी भी व्यापारी को पूछेंगे तो वह दिक्कतें गिनाने लगेंगे।  जीएसटी पोर्टल के नहीं चलने की शिकायत आम है। इसके अलावा बड़ी मुश्किल उन बदलावों की है, जो जीएसटी में हो रहे हैं। बदलावों की समय पर और सही जानकारी करदाता तक नहीं पहुंचती। इससे वह न सिर्फ रिटर्न से चूक रहे हैं, बल्कि उसका खामियाजा भी भुगत रहे हैं। एक जुलाई 2017 को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली लागू की गई। इसके बाद से जीएसटी में लगातार बदलाव हो रहे हैं। कभी स्लैब में बदलाव तो कभी वस्तु की परिभाषा को लेकर। इतना ही नहीं जैसे-जैसे जीएसटी में पेंच फंस रहे हैं, उसे आसान करने के लिए उतने ज्यादा बदलाव हो रहे हैं। यही बदलाव कई बार झंझट बन जा रहे हैं। इसके चलते व्यापारियों पर जुर्माना लग रहा है और वह डिफाल्टर बन रहे हैं। कई ऐसे मामले हैं, जिसमें दो साल पहले हुए बदलाव के बाद आज भी  स्थिति स्पष्ट नहीं है।  इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के अध्यक्ष पंकज गुप्ता कहते हैं कि जीएसटी काउंसिल कोई फैसला लेती है तो उनके नोटिफिकेशन में लंबा वक्त लग रहा है, जो कन्फ्यूजन को बढ़ाता है। साथ ही इसकी जानकारी करदाता को भी नहीं रहती है। इसका सबसे अच्छा तरीका यह था कि जैसे ही कोई बदलाव होता है, करदाता के मोबादल नंबर और मेल पर उस जानकारी को साझा कर लिया जाए। क्योंकि जीएसटी में पंजीकृत हर शख्स का मोबाइल नंबर और मेल आईडी उपलब्ध है। 

दो साल से उलझा है मामला
नमकीन उद्योग से जुड़े उद्यमी अनिल मरवाह कहते हैं कि 2017 में जीएसटी लागू हुआ तो नमकीन पर 12 फीसदी टैक्स था। इसका विरोध हुआ। महीने भर बाद इसे ब्रांडेड और अनब्रांडेड में बांट दिया गया। क्रमश: टैक्स 12 और 5 फीसदी करने की घोषणा हुई। जब नोटिफिकेशन हुआ तो अनब्रांडेड की जगह लूज नमकीन पर 5 फीसदी जीएसटी बताया गया। दो साल होने को है, लघु एवं सूक्ष्म उद्योग के तहत इकाई संचालित करने वाले नमकीन कारोबारियों को कोई राहत नहीं मिल पाई है। वह पैक्ड नमकीन देते हैं तो उसे भी ब्रांडेड वाला टैक्स देना पड़ रहा है। ऐसे करीब डेढ़ सौ इकाइयां अकेले देहरादून में हैं, जो खामी के चलते घाटे में है।

होटल इंडस्ट्री में भी संशय
होटल इंडस्ट्री में जीएसटी को लेकर भी लंबे समय से संशय बना हुआ है। यहां टैक्स स्लैब कम किया गया, लेकिन जो आदेश जारी हुए, वह इतने जटिल बना दिए गए कि होटल इंडस्ट्री यह समझ नहीं पाई कि वह कहां 18 फीसदी टैक्स लेगी और कहां 5 फीसदी टैक्स लगाएगी। उद्योगपति पंकज गुप्ता कहते हैं कि यह कमी सिस्टम की है, जो करदाता को समझाने में विफल रहा। यह जिम्मेदारी अधिकारियों की थी कि वह करदाताओं को जागरूक करें कि उन्हें अब कहां किस तरह से टैक्स लेना है, लेकिन इसके लिए सिर्फ औपचारिकताएं होती हैं और जो संशय होते हैं, उन्हें दूर नहीं किया जाता। 

करे कोई और भरे कोई
जीएसटी की खामियों को लेकर टैक्स एक्सपर्ट अनूप नरुला बताते हैं कि अगर सामान बेचने वाला सप्लायर जीएसटी नहीं भर रहा है और सामान खरीदने वाला दुकानदार जीएसटी फाइल कर रहा है, तो सप्लायर को दिए गए टैक्स का रिफंड दुकानदार को यह कहकर नहीं किया जा रहा है कि उसका टैक्स यहां जमा नहीं है। यह चूक जीएसटी फाइल नहीं करने वाली की है और इसका नुकसान जीएसटी फाइल करने वाले को भुगतना पड़ रहा है। ऐसे में जिसका रिफंड मिलना है, वह कैसे सुनिश्चित करे कि जिससे उसने सामान खरीदा है वह अपना रिटर्न फाइल करे। यह सुनिश्चित करना जीएसटी नेटवर्क का काम है, अधिकारियों का काम है, लेकिन वह लेटफीस और पेनाल्टी से राजस्व बढ़ाने का सपना दिखा रहे हैं। 

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